Wednesday, December 26, 2018

'चुड़ैल' जिसने बचाई सौ से ज़्यादा लोगों की जान

धारधार कुल्हाड़ियां लिए भीड़ ने जब ज़ूरा कारूहिंबी के घर को घेर कर अंदर शरण लिए लोगों को बाहर निकालने की मांग की तो उस वक़्त वो बिलकुल निहत्थी थीं.

उनके पास अगर कुछ था तो जादुई शक्तियों की उनकी साख थी.

यही साख और इससे हथियारबंद लोगों के मन में पैदा हुआ वो डर ही था जिसने उन सौ से अधिक लोगों की जान बचा दी जो अपनी जान बचाने के लिए उनके घर के भीतर छिपे थे.

ये रवांडा में हुए जनसंहार के दिनों की बात है.

1994 में शुरू हुए इस नरसंहार में रवांडा के तुत्सी समुदाय के करीब आठ लाख लोग मारे गए थे. मारे गए इन लोगों में हमलावर हूतू समुदाय के उदारवादी लोग भी शामिल थे.

इन में कारूहिंबी की पहली बेटी भी थीं.

इस नरसंहार के दो दशक बाद अपने दो छोटे कमरों के घर में द इस्ट अफ़्रीकन से बात करते हुए उन्होंने कहा था. "उस नरसंहार के दौरान मैंने इंसान के दिल का कालापन देखा था." इसी घर में उन्होंने उन लोगों को छुपाया था और उनकी जान बचायी थी.

बीते सोमवार को रवांडा की राजधानी किगाली से क़रीब एक घंटे की दूरी पर पूर्व में स्थित मासूमो गांव में कारूहिंबी की मौत हो गई. किसी को नहीं पता है कि वो कितने साल की थीं.

अधिकारिक दस्तावेज़ों में उनकी उम्र 93 साल है जबकि वो अपने आप को सौ बरस से ज़्यादा का बताती थीं.

जो भी हो, लेकिन जब हूतू मिलिशिया ने उनके गांव पर हमला किया था तब वो बहुत युवा नहीं थीं.

पारंपरिक ओझा परिवार में पैदा हुईं
कारूहिंबी के बारे में जो बहुत सी कहानियां लिखी गई हैं उनके मुताबिक वो एक पारंपरिक ओझा परिवार में 1925 में पैदा हुईं थीं. जन्म का ये साल उनके अधिकारिक पहचान पत्र से लिया गया है.

ये कहा जा सकता है कि 1994 की घटनाओं के तार उनके बचपन से ही जुड़ने शुरू हो गए थे. यही वो दौर था जब रवांडा पर बेल्जियम का शासन हुआ और इस ओपनिवेशिक शक्ति ने रवांडा के लोगों को स्पष्ट रूप से बंटे हुए समूहों में बांट दिया. पहचान पत्र जारी करके लोगों को बता दिया गया कि वो हूतू हैं या तुत्सी.

कारूहिंबी का परिवार हूतू था और ये समुदाय रवांडा में बहुसंख्यक था. लेकिन अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों को उच्च वर्गीय समझा जाता था और यही वजह थी कि बेल्जियम के शासनकाल में नौकरियों और व्यापार में इसी समूह का बोलबाला था.

इस बंटवारे ने दोनों समूहों के बीच तनाव भी पैदा किया. 1959 में कारुहिंबी युवा ही थीं जब तुत्सी राजा किगेरी पंचम और उनके दसियों हज़ार तुत्सी समर्थकों को पड़ोसी उगांडा में शरण लेनी पड़ी. ये रवांडा में हुई हूती क्रांति के बाद की बात है.

जब 1994 में हूतू राष्ट्रपति जुवेनाल हेब्यारिमाना का विमान मार गिरा दिए जाने के बाद तुत्सियों के ख़िलाफ़ हिंसा शुरू हुई तो ये पहली बार नहीं था जब कारूहिंबी ने इस तरह की हिंसा देखी थी.

Monday, December 17, 2018

जीत के लिए भारत को 175 रन और चाहिए, पांच विकेट आउट होना बाकी

पर्थ में खेले जा रहे दूसरे टेस्ट के चौथे दिन का खेल खत्म होने तक भारत ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरी पारी में पांच विकेट पर 112 रन बना लिए हैं। टेस्ट जीतने के लिए उसे 175 रन और बनाने होंगे। हनुमा विहारी 24 और ऋषभ पंत 9 रन बनाकर नाबाद हैं। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया की टीम दूसरी पारी में 243 रन पर ऑलआउट हुई। उसने पहली पारी में भारत के खिलाफ 43 रन की लीड ली थी। इस तरह उसकी कुल बढ़त 286 रन हो गई और भारत को जीतने के लिए 287 रन का लक्ष्य मिला। भारत के लिए दूसरी पारी में मोहम्मद शमी ने छह विकेट लिए।

लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम की शुरुआत दूसरी पारी में खराब रही। मिशेल स्टार्क ने लोकेश राहुल को पहले ही ओवर में पवेलियन का रास्ता दिखाया। उसके बाद चौथे ओवर में जोश हेजलवुड ने चेतेश्वर पुजारा को आउट कर भारत को बड़ा झटका दिया। इन दोनों के बाद कप्तान विराट कोहली, मुरली विजय और अजिंक्य रहाणे भी पवेलियन लौट गए। इससे भारत के जीतने की संभावनाओं को झटका लगा। पांच विकेट लेकर ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों ने अपनी टीम का पलड़ा भारी कर दिया है।

पहला विकेट: मिशेल स्टार्क ने भारत को पहले ही ओवर में झटका दिया। उन्होंने चौथी गेंद पर लोकेश राहुल को बोल्ड कर दिया। राहुल पहली पारी में भी कुछ खास नहीं कर पाए थे और दो रन बनाकर आउट हो गए थे।
दूसरा विकेट: जोश हेजलवुड ने चौथे ओवर में भारत को दूसरा झटका दिया। उन्होंने पांचवीं गेंद पर चेतेश्वर पुजारा को विकेटकीपर टिम पेन के हाथों कैच आउट कराया। पुजारा ने 11 गेंद में 4 रन बनाए। 

तीसरा विकेट: ऑस्ट्रेलिया को सबसे बड़ी सफलता 20वें ओवर में मिली। स्पिनर नॉथन लियोन ने कप्तान विराट कोहली को आउट कर दिया। कोहली ने टर्न के लिए गेंद को खेला, लेकिन गेंद स्पिन नहीं हुई। उनके बल्ले के बाहरी किनारे से लगकर गेंद स्लिप में चली गई, जहां ख्वाजा ने कैच पकड़ लिया। कोहली ने 40 गेंद में 17 रन बनाए।

चौथा विकेट: कोहली के आउट होने के बाद मुरली विजय भी चलते बने। विजय को भी लियोन ने ही आउट किया। उन्हों 22वें ओवर की पांचवीं गेंद पर लियोन ने बोल्ड कर दिया। लियोन का मैच में यह सातवां विकेट है। विजय ने 67 गेंद में 20 रन बनाए।

पांचवां विकेट: हेजलवुड ने 36वें ओवर में अजिंक्य रहाणे को आउट कर दिया। रहाणे क्रीज पर जम चुके थे। ऐसा लग रहा था कि वे भारत को मजबूत स्थिति में ले जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने प्वाइंट पर ट्रैविस हेड को कैच थमा दिया। रहाणे ने 47 गेंद में 30 रन बनाए।

उस्मान ख्वाजा का अर्धशतक
चौथे दिन पहले सत्र में ऑस्ट्रेलिया ने दूसरी पारी में मजबूत शुरुआत की। तीसरे दिन के नॉट आउट बल्लेबाज उस्मान ख्वाजा और टिम पेन ने मिलकर आज 58 रन बनाए। ख्वाजा ने करियर का 15वां अर्धशतक लगाया। मैच के दौरान एक बार भारतीय कप्तान विराट कोहली ऑस्ट्रेलियाई कप्तान पेन से उलझ गए। इसके बाद अंपायरों ने बीच-बचाव किया।

पांचवां विकेट: चौथे दिन मोहम्मद शमी ने भारत को पहली सफलता दिलाई। उन्होंने पारी के 79वें ओवर में टिम पेन को आउट कर दिया। पेन 116 गेंद में 37 रन बनाकर कोहली को कैच थमा बैठे। उन्होंने ख्वाजा के साथ पांचवें विकेट के लिए 72 रन की साझेदारी की। पेन ने पहली पारी में 38 रन बनाए थे।

छठा विकेट: शमी ने पेन के बाद अगली ही गेंद पर एरॉन फिंच को पवेलियन भेज दिया। फिंच पहले दिन 25 रन पर रिटायर्ड हर्ट हुए थे। उन्हें अंगुली में चोट लगी थी। फिंच ने शमी की गेंद पर लेग साइड में शॉट लगाना चाहा, लेकिन गेंद उनके ग्लव्स से लगकर विकेटकीपर ऋषभ पंत के हाथों में चली गई। फिंच ने 31 गेंद की पारी में 25 रन बनाए।

Wednesday, December 5, 2018

जारी हुए प्राइमरी स्तर के नतीजे, ऐेसे देखें

उत्तर प्रदेश टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (UPTET) प्राइमरी स्तर के नतीजे जारी कर दिए गए हैं. उत्तर प्रदेश बेसिक एजुकेशन बोर्ड की ओर से से मंगलवार रात को परीक्षा के नतीजे जारी किए गए थे, हालांकि बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट पर परीक्षा का लिंक जनरेट नहीं हुआ है. लिंक जनरेट होने के बाद परीक्षा में हिस्सा लेने वाले उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट upbasiceduboard.gov.in पर जाकर अपना रिजल्ट देख सकेंगे.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार परीक्षा के नतीजे जारी कर दिए गए हैं और 5 दिसंबर से उम्मीदवार अपने रिजल्ट देख सकेंगे. रिपोर्ट के अनुसार परीक्षा में 33 फीसदी उम्मीदवार पास हुए हैं. इसमें 366285 उम्मीदवार पास हुए हैं, जबकि इस परीक्षा में करीब 11 लाख उम्मीदवारों ने इस परीक्षा में हिस्सा लिया था.

UPTET 2018: जारी हुई आंसर की, ऐसे करें डाउनलोड

बता दें कि बोर्ड ने 18 नवंबर को दो शिफ्ट में इस परीक्षा का आयोजन किया था, जिसमें करीब 16 लाख उम्मीदवार शामिल थे. यह परीक्षा प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर को लेकर हुई थी, जिसमें 11 लाख उम्मीदवार प्राथमिक स्तर के थे. बताया जा रहा है कि इस पिछले साल के मुकाबले पास होने वाले उम्मीदवारों की संख्या में इजाफा हुआ है.

बताया जा रहा है कि लिंक एक्टिवेट होने के बाद उम्मीदवार 7 जनवरी तक अपना रिजल्ट देख सकेंगे. अगर आप भी अपना रिजल्ट देखना चाहते हैं, तो इन स्टेप्स को फॉलो कर अपना रिजल्ट देख सकते हैं.

इस बीच, जयललिता और एमजीआर के बीच मतभेद की खबरें भी आईं, लेकिन जयललिता ने 1984 में पार्टी के प्रचार अभियान का नेतृत्व किया. 1987 में रामचंद्रन की मृत्यु के बाद अन्नाद्रमुक दो टुकड़ों में बंट गई. एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन और जयललिता दोनों के पक्ष मेंसमर्थक-कार्यकर्ता बंट चुके थे. 1988 में जानकी के 21 दिन तक मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया. वहीं, अगले चुनाव में हार के बाद जानकी ने इस्तीफा दे दिया और जयललिता को आगे आने का मौका मिला.

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जनता के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाने के बाद जयललिता पहली बार साल 1991 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं. कई हार और जीत के सफर के साथ उन्होंने पांच बार प्रदेश की कमान संभाली. आय से अधिक संपत्ति रखने के लिए जयललिता पर केस चला जिसमें वो दोषी भी पाई गईं. आखिरकार27 सितंबर 2014 को बेंगलुरु की एक अदालत ने जयललिता को चार साल कैद की सजा सुनाई गई. 

Monday, November 19, 2018

नाम बदलने से भीड़ नहीं रुकेगी, कुछ करना है तो नए शहर बनाइये

साहित्य आजतक 2018 में अंतिम दिन ख्यात गीतकार जावेद अख्तर ने शिरकत की. उन्होंने 'साहित्य और हम' सेशन में कई सवालों के दिलचस्प जवाब दिए. उन्होंने शहरों के नाम बदलने से लेकर अयोध्या विवाद तक पर बेबाकी से बात की. इस सेशन को एंकर अंजना ओम कश्यप ने मॉडरेट किया.

शहरों के नाम बदलने के सवाल पर जावेद अख्तर ने कहा- अब किसी तरह तो शहरों को स्मार्ट बनाया जाए, नाम ही बदलो. महत्वपूर्ण बात यह है, जिस पर कोई गौर नहीं कर रहा है कि इस देश में कम से कम 100-150 नए शहर बनने चाहिए. आज गांवों से शहरों की ओर पलायन बड़े स्तर पर है. दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई सब जगह ये हैं. आजादी के बाद से मुट्ठीभर शहर बने हैं. एक चंडीगढ़ बना है, नोएडा और गुड़गांव बने हैं. इसी तरह साउथ में एक-दो शहर हैं.  

बॉलीवुड एक खराब नाम है, ये राष्ट्रवादी भावना के खिलाफ है: जावेद

अख्तर ने कहा- यदि आपको दोनों तरफ के कम्युनल लोग गलत मानने लगें तो समझना कोई सही काम कर रहे हो. मुझे तो कम्युनल मुस्लि‍म और कम्युनल हिंदू दोनों ही हेट मैसेज भेजते रहते हैं. कम्युनल हिंदू कहते हैं तुम तो पाकिस्तान चले जाओ, देशद्रोही हो, कम्युनल मुस्लि‍म कहते हैं हिंदू नाम भ रख लो न. तुम तो बिक ही गए हो. मतलब दोनों ओर से यदि गाली नहीं पड़ रही तो समझो गड़बड़ है.

''हमें 5000 साल से लोकतंत्र की ट्रेनिंग मिली''

जावेद अख्तर ने कहा कि राष्ट्रवाद नैसर्गिक है. जिस तरह हमें अपने शरीर से, शहर से प्रेम होता है उसी तरह हम जिस देश में पैदा हुए हैं उससे नफरत कैसे कर सकते हैं. हम सुदूर रहने वाली मैरीकॉम जिससे कभी मिले नहीं, जहां वो रहती हैं वहां गए नहीं, फिर भी जब वो जीतती हैं तो हमें खुशी होती है. ये क्यों होती है, क्योंकि हमारे अंदर देशप्रेम है.

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जावेद अख्तर ने कहा कि जो आपसे किसी भी बात से सहमत नहीं उससे आप कितनी नफरत करते हैं, इसे देशप्रेम का बैरोमीटर बनाया जा रहा है. हमें 5000 साल से लोकतंत्र में ट्रेनिंग मिली है. हमारे यहां असहमत होना पाप नहीं है, ये शुरू से हमारे देश की संस्कृति रही है. इस मुल्क में नास्तिक को संत माना गया है. जो लोग असहमत लोगों से नफरत करना सिखा रहे हैं, वे देश की संस्कृति के हमारा पीछा छुड़वा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रवाद से नफरत की भावना पैदा होती है तो गलत है, लेकिन राष्ट्रवाद यदि प्यार करना सिखाए तो सही है. राष्ट्रवाद के नाम पर फिल्म इंडस्ट्री के बंटे हुए होने पर जावेद अख्तर ने कहा कि जिस समाज में लोकतंत्र  होता वो बंटा हुआ ही होता है. सब एक तरह सोचे अगर ऐसा मानना है तो सउदी अरब चले जाना चाहिए.

Tuesday, November 6, 2018

RBI के बचाव में कूदे रघुराम राजन, कहा- देशहित में है ये आजादी

रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार के बीच जारी खींचतान के बीच जहां अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भारत सरकार को कदम पीछे खींचने की सलाह दे रही है, वहीं अब पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि एक स्वतंत्र और स्वायत्त केन्द्रीय बैंक से राष्ट्र को फायदा ही पहुंचता है.

एक प्रमुख बिजनेस टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू के मुताबिक रघुराम राजन का मानना है कि भारत सरकार और केन्द्रीय रिजर्व बैंक के बीच मचे संग्राम पर तभी लगाम लग सकता है जब दोनों एक-दूसरे की मंशा और स्वायत्तता का सम्मान करें.

RBI से उसके रिजर्व का एक-तिहाई चाहती है मोदी सरकार, मांगे 3.6 लाख करोड़

राजन ने कहा कि जहां तक संभव है रिजर्व बैंक की स्वायत्तता को बरकरार रखना देश के हित में है और ऐसा करना देश की परंपरा रही है. गौरतलब है कि मौजूदा गवर्नर उर्जित पटेल ने सितंबर 2016 में रघुराम राजन से केन्द्रीय बैंक की कमान अपने  हाथ में ली थी.

दोनों के रिश्तों में खटास की प्रमुख वजह वित्तीय फैसलों में रिजर्व बैंक की अधिक भूमिका को माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक केन्द्र सरकार ने 19 नवंबर को होने आरबीआई बोर्ड बैठक में अपना अहम एजेंडा सामने करते हुए बोर्ड में रिजर्व बैंक गवर्नर की भूमिका को कम करने का काम कर सकती है.

RBI से उलझी मोदी सरकार को IMF ने दी पीछे हटने की सलाह

दरअसल, केन्द्र सरकार और रिजर्व बैंक गवर्नर के बीच विवाद की अहम वजह केन्द्रीय रिजर्व बैंक के पास मौजूद 9.6 ट्रिलियन (9.6 लाख करोड़) रुपये की रकम है. केन्द्र सरकार का दावा  है कि इतनी बड़ी रकम रिजर्व बैंक के रिजर्व खाते में रहने का कोई तुक नहीं है. सरकार के मुताबिक इतना बड़ा रिजर्व रखने का तर्क मौजूदा परिस्थिति में पूरी तरह गलत है.

जहां सरकार इस खजाने से एक-तिहाई पैसा निकालकर देश में सरकारी बैंकों में नई ऊर्जा का संचार करते हुए देश में कारोबारी तेजी लाना चाहती है. वहीं केन्द्रीय बैंक सरकार के इस प्रस्ताव को अपनी स्वायत्तता पर हमला मान रही है.

Monday, November 5, 2018

लोगों में टशन के बावजूद ईज़ ऑफ़ लिविंग इंडेक्स में ये टॉप पर क्यों?

सितंबर का महीना था. बारिशों का मौसम. मैं पुणे के सदाशिव पेठ इलाक़े की गलियों में घूम रही थी. जब मैं एक मंदिर के पास से गुज़री, तो मेरी नज़र एक बोर्ड पर पड़ी.

इस पर मराठी में लिखा था, 'ये रहालकर की निजी पार्किंग है. मंदिर आने वाला कोई और शख़्स यहां गाड़ी नहीं पार्क कर सकता है. अगर किसी ने अपनी गाड़ी यहां खड़ी की तो गाड़ी के टायरों की हवा निकाल दी जाएगी और उस पर ताला लगा दिया जाएगा. ताला तभी खुलेगा, जब वो इंसान 500 रुपये जुर्माना भरेगा.'

पार्किंग न करने की चेतावनी देने वाला ये मज़ेदार बोर्ड देख कर मुझे हंसी आ गई.

असल में एक घंटे पहले ही मैं पुणे के मशहूर रेस्टोरेंट एसपी बिरयानी हाउस गई थी. वहां की स्वादिष्ट बिरयानी खाते हुए मैंने वहां लगा एक बोर्ड देखा था.

उस पर लिखा था, 'हमारी बिरयानी कभी भी ख़त्म हो सकती है. कृपया कोई नाराज़ होकर मैनेजमेंट से बहस न करे.'

पुणे शहर के पुराने हिस्से में आप को ऐसे ही तमाम साइन बोर्ड मिल जाएंगे. ऐसे बोर्ड 'पुनेरी पात्या' के नाम से जाने जाते हैं. इन्हें आप कार पार्किंग, रेस्टोरेंट, दुकानों और मकानों पर लगे देख सकते हैं.

साइन बोर्ड की सोशल मीडिया पर धूम
कई साइन बोर्ड तो ऐसे हैं, जो कई दशकों से लगे हैं. इसके अलावा अक्सर नए बोर्ड भी लगा दिए जाते हैं. पुणे के ये बोर्ड इतने मशहूर हैं कि सोशल मीडिया पर अक्सर सुर्ख़ियां बटोरते हैं.

कुछ मज़ेदार होते हैं, तो कुछ में लंबा-चौड़ा ज्ञान और तंज़ देखने को मिल जाता है. कई बार तो इन पर बहुत कड़वी बातें भी लिखी दिख जाती हैं.

पुणे की पुरानी गलियों में घूमते हुए ऐसे जिन बोर्ड पर मेरी निगाह पड़ी है, उनमे से कुछ तो मुझे बहुत पसंद आए.

जैसे, 'अगर एक बार घंटी बजाने के बाद भी जवाब नहीं मिलता, तो समझिए कि हम आप से नहीं मिलना चाहते. तो निकल लीजिए.'

'घंटी बजाने के बाद इंतज़ार कीजिए. यहां रहने वाले इंसान हैं, स्पाइडरमैन नहीं.'

'अगर कोई यहां गाड़ी पार्क करता है, तो गाड़ी के टायर पंक्चर कर दिए जाएंगे.'

'हमारे बेटे की शादी की तारीख़ तय हो गई है, तो अब शादी का कोई नया प्रस्ताव न ले कर आएं.'

सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके डॉक्टर श्रीधर मधुकर दीक्षित कहते हैं कि, 'ये बात शायद 1960 या 1970 के दशक की होगी, जब पत्या लिखे जाने लगे. पुणे के लोग सीधे-सपाट होते हैं. वो पत्या के ज़रिए ये बताने से नहीं हिचकते कि कैसा बर्ताव करना चाहिए.'

पुणेकर सख्तमिज़ाजी के लिए मशहूर
मुंबई की तर्ज पर पुणे के बाशिदों को पुणेकर कहा जाता है. वो अपनी सख्तमिज़ाजी के लिए पूरे इलाक़े में मशहूर हैं, या यूं कहें कि बदनाम हैं. कई दफ़े तो उनका बर्ताव बहुत रुख़ा होता है.

पुणे के लोग बहुत कम शब्दों में बात करते हैं. जो भी वो बोलते हैं वो अक्सर सपाट और सख्त लहजे वाली बातें होती हैं.

पुणे के लोगों का ये टशन कई फ़िल्मों जैसे मुंबई-पुणे-मुंबई और टीवी कार्यक्रम जैसे पुनेरी पुनेकर में भी दिखाया गया है.

मूल रूप से नासिक के रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर चेतन चंद्ररात्रे कहते हैं कि 'पुणे के लोगों से दोस्ताना होने के लिए बहुत वक़्त देना पड़ता है और कोशिश करनी पड़ती है. पुणे में मेरे रूममेट मेरी मराठी का अक्सर मज़ाक उड़ाते थे. जब मैं कॉलेज में था तो वो अक्सर मेरी मराठी भाषा में ग़लतियां ठीक किया करते थे. मुझे उन लोगों का क़रीबी बनने में कई महीने लग गए थे.'