Monday, November 19, 2018

नाम बदलने से भीड़ नहीं रुकेगी, कुछ करना है तो नए शहर बनाइये

साहित्य आजतक 2018 में अंतिम दिन ख्यात गीतकार जावेद अख्तर ने शिरकत की. उन्होंने 'साहित्य और हम' सेशन में कई सवालों के दिलचस्प जवाब दिए. उन्होंने शहरों के नाम बदलने से लेकर अयोध्या विवाद तक पर बेबाकी से बात की. इस सेशन को एंकर अंजना ओम कश्यप ने मॉडरेट किया.

शहरों के नाम बदलने के सवाल पर जावेद अख्तर ने कहा- अब किसी तरह तो शहरों को स्मार्ट बनाया जाए, नाम ही बदलो. महत्वपूर्ण बात यह है, जिस पर कोई गौर नहीं कर रहा है कि इस देश में कम से कम 100-150 नए शहर बनने चाहिए. आज गांवों से शहरों की ओर पलायन बड़े स्तर पर है. दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई सब जगह ये हैं. आजादी के बाद से मुट्ठीभर शहर बने हैं. एक चंडीगढ़ बना है, नोएडा और गुड़गांव बने हैं. इसी तरह साउथ में एक-दो शहर हैं.  

बॉलीवुड एक खराब नाम है, ये राष्ट्रवादी भावना के खिलाफ है: जावेद

अख्तर ने कहा- यदि आपको दोनों तरफ के कम्युनल लोग गलत मानने लगें तो समझना कोई सही काम कर रहे हो. मुझे तो कम्युनल मुस्लि‍म और कम्युनल हिंदू दोनों ही हेट मैसेज भेजते रहते हैं. कम्युनल हिंदू कहते हैं तुम तो पाकिस्तान चले जाओ, देशद्रोही हो, कम्युनल मुस्लि‍म कहते हैं हिंदू नाम भ रख लो न. तुम तो बिक ही गए हो. मतलब दोनों ओर से यदि गाली नहीं पड़ रही तो समझो गड़बड़ है.

''हमें 5000 साल से लोकतंत्र की ट्रेनिंग मिली''

जावेद अख्तर ने कहा कि राष्ट्रवाद नैसर्गिक है. जिस तरह हमें अपने शरीर से, शहर से प्रेम होता है उसी तरह हम जिस देश में पैदा हुए हैं उससे नफरत कैसे कर सकते हैं. हम सुदूर रहने वाली मैरीकॉम जिससे कभी मिले नहीं, जहां वो रहती हैं वहां गए नहीं, फिर भी जब वो जीतती हैं तो हमें खुशी होती है. ये क्यों होती है, क्योंकि हमारे अंदर देशप्रेम है.

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जावेद अख्तर ने कहा कि जो आपसे किसी भी बात से सहमत नहीं उससे आप कितनी नफरत करते हैं, इसे देशप्रेम का बैरोमीटर बनाया जा रहा है. हमें 5000 साल से लोकतंत्र में ट्रेनिंग मिली है. हमारे यहां असहमत होना पाप नहीं है, ये शुरू से हमारे देश की संस्कृति रही है. इस मुल्क में नास्तिक को संत माना गया है. जो लोग असहमत लोगों से नफरत करना सिखा रहे हैं, वे देश की संस्कृति के हमारा पीछा छुड़वा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रवाद से नफरत की भावना पैदा होती है तो गलत है, लेकिन राष्ट्रवाद यदि प्यार करना सिखाए तो सही है. राष्ट्रवाद के नाम पर फिल्म इंडस्ट्री के बंटे हुए होने पर जावेद अख्तर ने कहा कि जिस समाज में लोकतंत्र  होता वो बंटा हुआ ही होता है. सब एक तरह सोचे अगर ऐसा मानना है तो सउदी अरब चले जाना चाहिए.

Tuesday, November 6, 2018

RBI के बचाव में कूदे रघुराम राजन, कहा- देशहित में है ये आजादी

रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार के बीच जारी खींचतान के बीच जहां अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भारत सरकार को कदम पीछे खींचने की सलाह दे रही है, वहीं अब पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि एक स्वतंत्र और स्वायत्त केन्द्रीय बैंक से राष्ट्र को फायदा ही पहुंचता है.

एक प्रमुख बिजनेस टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू के मुताबिक रघुराम राजन का मानना है कि भारत सरकार और केन्द्रीय रिजर्व बैंक के बीच मचे संग्राम पर तभी लगाम लग सकता है जब दोनों एक-दूसरे की मंशा और स्वायत्तता का सम्मान करें.

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राजन ने कहा कि जहां तक संभव है रिजर्व बैंक की स्वायत्तता को बरकरार रखना देश के हित में है और ऐसा करना देश की परंपरा रही है. गौरतलब है कि मौजूदा गवर्नर उर्जित पटेल ने सितंबर 2016 में रघुराम राजन से केन्द्रीय बैंक की कमान अपने  हाथ में ली थी.

दोनों के रिश्तों में खटास की प्रमुख वजह वित्तीय फैसलों में रिजर्व बैंक की अधिक भूमिका को माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक केन्द्र सरकार ने 19 नवंबर को होने आरबीआई बोर्ड बैठक में अपना अहम एजेंडा सामने करते हुए बोर्ड में रिजर्व बैंक गवर्नर की भूमिका को कम करने का काम कर सकती है.

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दरअसल, केन्द्र सरकार और रिजर्व बैंक गवर्नर के बीच विवाद की अहम वजह केन्द्रीय रिजर्व बैंक के पास मौजूद 9.6 ट्रिलियन (9.6 लाख करोड़) रुपये की रकम है. केन्द्र सरकार का दावा  है कि इतनी बड़ी रकम रिजर्व बैंक के रिजर्व खाते में रहने का कोई तुक नहीं है. सरकार के मुताबिक इतना बड़ा रिजर्व रखने का तर्क मौजूदा परिस्थिति में पूरी तरह गलत है.

जहां सरकार इस खजाने से एक-तिहाई पैसा निकालकर देश में सरकारी बैंकों में नई ऊर्जा का संचार करते हुए देश में कारोबारी तेजी लाना चाहती है. वहीं केन्द्रीय बैंक सरकार के इस प्रस्ताव को अपनी स्वायत्तता पर हमला मान रही है.

Monday, November 5, 2018

लोगों में टशन के बावजूद ईज़ ऑफ़ लिविंग इंडेक्स में ये टॉप पर क्यों?

सितंबर का महीना था. बारिशों का मौसम. मैं पुणे के सदाशिव पेठ इलाक़े की गलियों में घूम रही थी. जब मैं एक मंदिर के पास से गुज़री, तो मेरी नज़र एक बोर्ड पर पड़ी.

इस पर मराठी में लिखा था, 'ये रहालकर की निजी पार्किंग है. मंदिर आने वाला कोई और शख़्स यहां गाड़ी नहीं पार्क कर सकता है. अगर किसी ने अपनी गाड़ी यहां खड़ी की तो गाड़ी के टायरों की हवा निकाल दी जाएगी और उस पर ताला लगा दिया जाएगा. ताला तभी खुलेगा, जब वो इंसान 500 रुपये जुर्माना भरेगा.'

पार्किंग न करने की चेतावनी देने वाला ये मज़ेदार बोर्ड देख कर मुझे हंसी आ गई.

असल में एक घंटे पहले ही मैं पुणे के मशहूर रेस्टोरेंट एसपी बिरयानी हाउस गई थी. वहां की स्वादिष्ट बिरयानी खाते हुए मैंने वहां लगा एक बोर्ड देखा था.

उस पर लिखा था, 'हमारी बिरयानी कभी भी ख़त्म हो सकती है. कृपया कोई नाराज़ होकर मैनेजमेंट से बहस न करे.'

पुणे शहर के पुराने हिस्से में आप को ऐसे ही तमाम साइन बोर्ड मिल जाएंगे. ऐसे बोर्ड 'पुनेरी पात्या' के नाम से जाने जाते हैं. इन्हें आप कार पार्किंग, रेस्टोरेंट, दुकानों और मकानों पर लगे देख सकते हैं.

साइन बोर्ड की सोशल मीडिया पर धूम
कई साइन बोर्ड तो ऐसे हैं, जो कई दशकों से लगे हैं. इसके अलावा अक्सर नए बोर्ड भी लगा दिए जाते हैं. पुणे के ये बोर्ड इतने मशहूर हैं कि सोशल मीडिया पर अक्सर सुर्ख़ियां बटोरते हैं.

कुछ मज़ेदार होते हैं, तो कुछ में लंबा-चौड़ा ज्ञान और तंज़ देखने को मिल जाता है. कई बार तो इन पर बहुत कड़वी बातें भी लिखी दिख जाती हैं.

पुणे की पुरानी गलियों में घूमते हुए ऐसे जिन बोर्ड पर मेरी निगाह पड़ी है, उनमे से कुछ तो मुझे बहुत पसंद आए.

जैसे, 'अगर एक बार घंटी बजाने के बाद भी जवाब नहीं मिलता, तो समझिए कि हम आप से नहीं मिलना चाहते. तो निकल लीजिए.'

'घंटी बजाने के बाद इंतज़ार कीजिए. यहां रहने वाले इंसान हैं, स्पाइडरमैन नहीं.'

'अगर कोई यहां गाड़ी पार्क करता है, तो गाड़ी के टायर पंक्चर कर दिए जाएंगे.'

'हमारे बेटे की शादी की तारीख़ तय हो गई है, तो अब शादी का कोई नया प्रस्ताव न ले कर आएं.'

सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके डॉक्टर श्रीधर मधुकर दीक्षित कहते हैं कि, 'ये बात शायद 1960 या 1970 के दशक की होगी, जब पत्या लिखे जाने लगे. पुणे के लोग सीधे-सपाट होते हैं. वो पत्या के ज़रिए ये बताने से नहीं हिचकते कि कैसा बर्ताव करना चाहिए.'

पुणेकर सख्तमिज़ाजी के लिए मशहूर
मुंबई की तर्ज पर पुणे के बाशिदों को पुणेकर कहा जाता है. वो अपनी सख्तमिज़ाजी के लिए पूरे इलाक़े में मशहूर हैं, या यूं कहें कि बदनाम हैं. कई दफ़े तो उनका बर्ताव बहुत रुख़ा होता है.

पुणे के लोग बहुत कम शब्दों में बात करते हैं. जो भी वो बोलते हैं वो अक्सर सपाट और सख्त लहजे वाली बातें होती हैं.

पुणे के लोगों का ये टशन कई फ़िल्मों जैसे मुंबई-पुणे-मुंबई और टीवी कार्यक्रम जैसे पुनेरी पुनेकर में भी दिखाया गया है.

मूल रूप से नासिक के रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर चेतन चंद्ररात्रे कहते हैं कि 'पुणे के लोगों से दोस्ताना होने के लिए बहुत वक़्त देना पड़ता है और कोशिश करनी पड़ती है. पुणे में मेरे रूममेट मेरी मराठी का अक्सर मज़ाक उड़ाते थे. जब मैं कॉलेज में था तो वो अक्सर मेरी मराठी भाषा में ग़लतियां ठीक किया करते थे. मुझे उन लोगों का क़रीबी बनने में कई महीने लग गए थे.'